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हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास

हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास PDF | पद्य साहित्य के इतिहास को कितने भागों में बांटा गया है?

पद्य साहित्य से आप क्या समझते हैं

पद्य साहित्य, साहित्य की वहां विधा है जिसमें किसी कहानियां मनोभाव को कलात्मक रूप में किसी भाषा द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है

हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास को कितने भागों में बांटा गया है?

हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास को चार भागों में बांटा गया है।

  • वीरगाथा काल
  • भक्ति काल,
  • रीतिकाल,
  • आधुनिक काल।
काल समय अवधि
वीरगाथा काल सन 993 से सन 1318 तक
भक्ति काल, सन 1318 से सन 1643 तक
रीतिकाल, सन 1643 से सन 1843 तक
आधुनिक काल।सन 1843 से आज तक

वीरगाथा काल –

वीरगाथा काल की विशेषताएँ

  • वीर और श्रंगार की प्रधानता वीरगाथा काल की कविताएँ वीरता को गौरवपूर्ण रूप से प्रस्तुत करती थीं। इनमें योद्धाओं की महाकवियों में गाथाएँ होती थीं जो उनके बलिदान और साहस की महिमा को बताती थीं।
  • युद्धों का सजीव वर्णन किया गया है।
  • काव्य शैलियों में प्रबंध और जीती शैलियों का प्रयोग
  • वीरगाथा काल की कविताएँ धार्मिक भावनाओं को भी प्रकट करती थीं। इनमें धर्म, भक्ति, और मानवता की महत्वपूर्ण संदेश होते थे।

वीरगाथा काल के कवि एवं उनकी रचनाएँ

कविरचनाएँ
चंद बरदाईप्रिथ्वीराज रासो
दलपति विजयखुमान रासो
अश्वघोष“बुद्धचरित”

भक्ति काल –

हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास जिसमें भक्ति काल की समय अवधि सन 1318 से सन 1643 तक है। इस युग को हिंदी साहित्य का स्वर्ण काल भी कहा जाता है। भक्ति काल, भारतीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण काव्यकाल है, जिसमें भक्ति और देवों के प्रति प्रेम की भावना को महत्वपूर्ण रूप से प्रस्तुत किया गया है। इस काल के कविताएँ भक्ति, प्रेम, और भगवान के प्रति श्रद्धा को प्रकट करती थीं।

भक्ति काल की विशेषताएँ –

  • भक्ति काल की कविताएँ भगवान के प्रति अद्वितीय प्रेम और भक्ति की भावना को प्रस्तुत करती थीं। इनमें कवियों की आत्मिक भक्ति और भगवान के साथ एकता की भावना व्यक्त होती थी।
  • साकार और निराकार ब्रह्म की उपासना
  • भक्ति, भावना की प्रधानता
  • मुक्तक एवं प्रबंध काव्य रचनाएं
  • श्रंगार वह शांत रस की प्रधानता

भक्ति काल को कितने भागों में बांटा गया है

हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास

भक्ति काल के कवि एवं उनकी रचनाएँ

भक्ति काल के कवि रचनाएँ
तुलसीदास (रामभक्ति शाखा)रामचरितमानस
सूरदास (कृष्णभक्ति शाखा)सूरसागर
मलिक मोहम्मद जायसी (प्रेमाश्रयी शाखा)पद्मावत
कबीरदास (ज्ञानाश्रयी शाखा)बीजक

रीतिकाल –

रीतिकाल की मुख्य विशेषताएँ –

  • श्रंगार वर्णन – इस युग की कविताओं, संयोग, श्रृंगार और वियोग श्रृंगार दोनों ही रचनाएं हुई है।
  • भाषा – इस काल की काव्यगत भाषा ब्रिज थी।
  • वीर रस – रीतिकाल में मुख्यता श्रंगार रस पर कविता लिखी गई है। परंतु इस काल में कवि भूषण ने वीर रस में कविताएं लिखी है।

वीरगाथा काल के कवि एवं उनकी रचनाएँ

कविउनकी रचनाएँ
बिहारी बिहारी सतसई
भिखारी दास काव्य निर्णय, श्रंगार निर्णय।
राजा जसवंत सिंह भाषा भूषण
चिंतामणिकवि कुंभ, कल्पतरु, रसविलास, श्रृंगार मंजरी

आधुनिक काल –

हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास जिसमें आधुनिक काल जिसकी समय अवधि सन 1843 से से आज तक है आधुनिक काल ने भारतीय साहित्य को नए दिशानिर्देश दिए और उसे विश्व साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान पर पहुँचाया। इस काल के लेखकों का काम आज भी हमारे समाज और साहित्य को प्रभावित कर रहा है।

आधुनिक हिंदी कविता को 6 भागों में बांटा गया है।

युग समय अवधि
भारतेंदु युगसन 1850 से सन 1900 तक
द्विवेदी युगसन 1900 से सन 1920 तक
छायावादी युगसन 1920 से सन 1936 तक
प्रगतिवादी युगसन 1936 से सन 1943 तक
प्रयोगवादी युगसन 1943 से सन 1950 तक
नई कवितासन 1950 से आज तक

भारतेंदु युग

भारतेंदु युग की विशेषताएं

  • राष्ट्रीयता की भावना – इस युग के कवियों ने देश प्रेम की रचनाओं के माध्यम से जनमानस में राष्ट्रीय भावना को बीजारोपण किया
  • अंग्रेजी शिक्षा का विरोध – भारतेंदु युगीन काव्य ने अंग्रेजी भाषा तथा अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार प्रसार के प्रति अपना विरोध कविताओं में प्रकट किया है

भारतेंदु युग के कवि के नाम एवं उनकी रचनाएं

भारतेंदु युग के कविरचनाएं
भारतेंदु हरिश्चंद्र प्रेम सरोवर
अंबिकादत्त व्यास पावस पचासा
बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’जनपद, आनंद अरुणोदय
प्रताप नारायण मिश्रप्रेमपुष्पावली, मन की लहर, लोकोक्ति शतक

द्विवेदी युग –

“द्विवेदी युग” एक प्राचीन भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक युग का नाम है जो कि वेदों के द्वितीय भाग के समय को दर्शाता है। इस युग को द्वितीय युग भी कहा जाता है। यह युग वेदों के अध्ययन और व्याख्यान के समय का है, जिसमें वेदों के सूक्तों का महत्वपूर्ण स्वरूप में अध्ययन किया जाता था। हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास जिसमें द्विवेदी युग की समय अवधि सन 1900 सन 1920 तक है इस युग के प्रवर्तक महावीर प्रसाद द्विवेदी है।

द्विवेदी युग की विशेषताएं

  • यज्ञ और हवन – यज्ञ और हवन के आयोजन का प्राचीन भारतीय समाज में महत्वपूर्ण स्थान था और इसका विधान ब्राह्मण ग्रंथों में मिलता है। यज्ञ के माध्यम से देवताओं की प्राप्ति और कल्याण की प्राप्ति का प्रयास किया जाता था।
  • संस्कृत भाषा – संस्कृत भाषा इस युग के दौरान महत्वपूर्ण भाषा थी और वेदों के पठन और व्याख्यान के लिए प्रमुख भाषा थी।
  • देशभक्ति – इस युग में मानव मात्र के प्रति प्रेम की भावना देखने को मिली

द्विवेदी युग के कवि एवं उनकी रचनाएं

द्विवेदी युग के कवि रचनाएं
अयोध्याय सिंह उपाध्यायप्रिय निवास (महाकाव्य),
मैथिलीशरण गुप्तसाकेत (महाकाव्य), पंचवटी (खंडकाव्य)
नाथूराम शर्माअनुराग रत्न, शंकर सरोज
श्रीधर पाठककश्मीरसुषमा, देहरादून

छायावादी युग

छायावादी युग की विशेषताएं

  • व्यक्तिवाद की प्रधानता – इस युग के कवियों ने अपनी वाणी को मध्यम बताते हुए अपने हर सुख-दुख कविताओं में प्रकट किए हैं।
  • प्रकृति चित्रण – प्रकृति के सौंदर्य पर मुग्ध छायावाद के कवियों ने प्रगति के आलंबन रूप के माध्यम से अपनी अनुभूतियों को कविताओं में अभिव्यक्त किया है।
  • भारतीय संस्कृति का महत्व – छायावादी कवि भारतीय संस्कृति, भाषा, और धर्म को महत्वपूर्ण तरीके से उजागर करते थे। वे अपनी कविताओं में भारतीय परंपरा के अलंकरण, मिथक, और पौराणिक कथाओं का सुंदर उपयोग करते थे।
  • आत्मा की मुक्ति के प्रति प्रेरणा –छायावादी कवि आत्मा की मुक्ति और स्वतंत्रता की प्राप्ति के प्रति प्रेरित होते थे। वे आत्मा के साथ एकता और स्वतंत्रता की महत्वपूर्णता को महत्वपूर्ण मानते थे।

छायावादी युग के कवि एवं उनकी रचनाएं

छायावादी युग के कविरचनाएं
जयशंकर प्रसाद कामायनी (महाकाव्य)
महादेवी वर्मा यामा (काव्य संग्रह)
सुमित्रानंदन पंत गुंजन, वीणा
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला गीतिका, अनामिका

प्रगतिवादी युग

हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास जिसमें प्रगतिवादी युग की समय अवधि सन 1936 से सन 1943 तक है प्रगतिवादी काव्य और कविताएँ समाज में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, और सामाजिक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान करने का प्रयास करती थीं। आधुनिकता, प्रगति, और विज्ञान के मूल्यों को प्रमोट करने का प्रयास किया।

प्रगतिवादी युग की विशेषताएँ

  • शोषकों के प्रति विद्रोह और शोषित से सहानुभूति – गतिवादी कवियों ने किसानों मजदूरों पर किए जाने वाले पूंजीपतियों के अत्याचार के प्रति अपना विद्रोह कविताओं में व्यक्त किया है।
  • ईश्वर के प्रति अनास्था – इस काल के कवियों ने ईश्वर के प्रति अनास्था का भाव व्यक्त किया है वह ईश्वरी शक्ति की तुलना में मानवीय शक्ति को अधिक महत्व देते थे।
  • विज्ञान का महत्व – प्रगतिवादी कवि और लेखक विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका को मानते थे और इसके महत्व को अपनी रचनाओं में प्रमोट करते थे। वे विज्ञान, प्रौद्योगिकी, और तकनीकी उन्नति के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते थे।
  • सामाजिक सुधार – प्रगतिवादी कवि और लेखक समाज में सामाजिक सुधार और न्याय के प्रति भी सकारात्मक थे। वे समाज में जाति, लिंग, और वर्ग के विभेद के खिलाफ थे और इसके खिलाफ लिखते थे।

प्रगतिवादी युग के कवि एवं उनकी रचनाएं

प्रगतिवादी युग के कवि रचनाएं
शिवमंगल सिंह सुमनजीवन के गान
नागार्जुनयुगधारा
त्रिलोचनधरती, गुलाब और बुलबुल
राम विलास शर्मारूप तरंग, बुद्ध वैराग्य तथा प्रारंभिक कविताएं

प्रयोगवादी युग

“प्रयोगवादी युग” भारतीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण काव्यात्मक काल है, हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास जिसमें प्रयोगवादी युग की समय अवधि सन 1943 से 1950 तक है इस युग के प्रवर्तक कवि अज्ञेय माने जाते हैं इस युग का प्रारंभ प्रथम तार सप्तक से माना जाता है

प्रयोगवादी युग की विशेषताएं

  • बुद्धि वाद की प्रधानता – इस युग के कवियों ने बुद्धि तत्व को अधिक प्रधानता दी है इस कारण काव्य में कहीं-कहीं दुरूहता आ गई है।
  • प्रेम भावनाओं का खुला चित्रण – इस काल के कवियों ने प्रेम भावनाओं का अत्यंत खुला चित्रण कर इसमें अश्लीलता का समावेश कर दिया है।
  • भाषा परिवर्तन – प्रयोगवादी कवियों ने हिन्दी भाषा को साहित्यिक रूप में सुधारने का प्रयास किया। उन्होंने संस्कृत से उपकृत शब्दों का प्रयोग किया और नई भाषा की रचना की।
  • सामाजिक परिवर्तन – यह काल समाज में विभिन्न परिवर्तनों के साथ आया, जैसे कि ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत भारत में शिक्षा की प्रोत्साहना, प्रेस की शुरुआत, और जनसंचार के विकास की बढ़ती मांग।

प्रयोगवादी युग के कवि एवं उनकी रचनाएं

प्रयोगवादी युग के कवि रचनाएं
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेयहरी घास पर क्षण भर, इंद्रधनुष ये रौंदे हुए
गजानन माधव मुक्तिबोधचाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल
धरमवीर भारतीठंडा लोहा, अंधायुग, कनुप्रिया
सर्वेश्वर दयाल सक्सेनाएक सूनी नाव, बाँस के पुल, काठ की घंटियाँ

नई कविता

हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास जिसमें नई कविता की समय अवधि सन 1950 से आज तक है नई कविताएँ परिस्थितियों की उपज हैं। इनका लेखन स्वतंत्रता के बाद किया गया था। नवीन भावबोध, नए मूल्य, शिल्प विधान आदि नई कविताओं की प्रमुख विशेषताएँ हैं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद पहली बार मनुष्य की असहायता, विवशता और निरूपायता सामने आई।

नई कविता की विशेषताएं

  • क्षणवाद को महत्त्व – इसी युग के कवियों ने जीवन के प्रत्येक क्षण को महत्वपूर्ण मानकर जीवन की एक-एक अनुभूति को कविता में स्थान दिया गया है।
  • अनुभूतियों का वास्तविक चित्रण – इस युग के कवियों ने मानव व समाज दोनों की अनुभूतियों का सच्चाई के साथ चित्रण किया है।
  • प्रयोगों में नवीनता – नई कविताओं में पुराने भावों और शिल्प विधानों के स्थान पर नवीन भावों और शिल्प विधानों को प्रस्तुत किया गया है।

नई कविता के कवि एवं उनकी रचनाएं

नई कविता के कविरचनाएं
भवानी प्रसाद मिश्रसन्नाटा, गीत फरोश
दुष्यंत कुमारसूर्य का स्वागत, आवाजों के घेरे
कुंवर नारायण कोई दूसरा नहीं, चक्रव्यूह
शमशेर बहादुर सिंहबात बोलेगी हम नहीं, इतने पास अपने

प्रश्नों के उत्तर (FAQs)

पद्य साहित्य के इतिहास से आप क्या समझते हैं?

पद्य साहित्य, साहित्य की वहां विधा है जिसमें किसी कहानियां मनोभाव को कलात्मक रूप में किसी भाषा द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है।

पद्य साहित्य के इतिहास को कितने भागों में बांटा गया है?

हिंदी पद्य साहित्य का इतिहास जिसे चार भागों में बांटा गया है वीरगाथा काल, भक्ति काल, रीतिकाल, आधुनिक काल, चारों कालो की समय सीमा अलग-अलग है।

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